दार्शनिक स्थल

केरवास पंचायत मे एकबहुत ही पुराना मंदिर हे जिसका नाम नीलकंठमहादेव हे ये मंदिर करीब 400 वर्ष पुराना हे यहा के पुजारी मोहन भारती के अनुसार इस मंदिर का नाम नीलकंठमहादेव आदि काल से चला आ रहा हे  

यहा पर शांडील्य ऋषि ने तपस्या की थी यहा पर वर्षो पुराना लिंग हे जिस पर बारह माह मूर्ति के उपर जल धारा बहती रहती हे जिससे मूर्ति का रंग हरा हो गया हे जिससे इसका नाम लीलया महादेव पड़ा !संवत 2013 मे पंचायत के पास गाँव खेरोट के रहने वाले फूल जी मीना ओर किशन लाल जी नागर को मंदिर मे यह आभास हुआ की व्हा पर कुछ प्रकाश हुआ हे जो 5 मिनट तक रहा उन्होने यह देखा उनको आसचर्य हुआ फिर उन्होने वाहा पर जो पुरानी मूर्ति थी उसको तुडवाया ओर उसमे से 3 लिंग प्रकट हुए जो वर्तमान मे हे यह मंदिर पहाड़ से घिरा हुआ हे यह दार्शनिक स्थान हे
यहाँ पर जो अभी मंदिर की पूजा करते हे मोहन भारती वे गो सेवा समिति के सदस्य हे, वे करीब 5 वर्षो से मंदिर की पूजा करते हे, पूर्व में इस मंदिर पर जाने से लोगो को डर लगता था क्यों की यहाँ पर घना जंगल हुआ करता  था ! आज तो दूर दूर से लोग यहाँ दर्शन को आते हे ,आस पास के लोग स्कूल के बच्चे पिकनिक मनाने भी आते हे सबसे ज्यादा भीड़ यहाँ पर सावन मास में रहती हे ,क्यों की सावन में बहुत सारे लोग सोलह सोमवार के व्रत करते हे तो चार मास तक ये व्रत चलते हे और प्रतेक सोमवार को लोग दूर दूर से यहाँ आते हे और शिव जी .भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते हे और वही पर अपना व्रत सम्पूर्ण करते हे और फिर अंतिम सोहल्वेसोमवार को शिव जी की पूजा करके भोजन वही बनाकर खाते हे और भोजन में लडूबनाये जाते हे जो घर पर जाकर आस पड़ोस में वितरण कर दिया जाता हे !ऐसी मान्यता हे के लडुओ को रात में नहीं रखते हे 

यंहा पर मंदिर होने की वजह से जंगल भी बचा हुआ हे ,दर्शन के लिए भक्तो की भीड़ से कोई अब पेड़ो को नहीं काटा जाता हे,पहले जब मंदिर निर्माण नहीं हुआ था जब जंगल धीरे -धीरे ख़त्म होने लगा था लेकिन मंदिर निर्माण के बाद यंहा पर पेड़ो की संख्या में बढोतरी हुयी हे जिससे यंहा बारिश भी अछि होती हे ,मंदिर में अक्सर हवन होने से वातावरण  भी शुद्ध रहता हे और प्राकर्तिक सोन्दर्य भी देखने को मिलता हे
यंहा पर पुराने बुजुर्गो का कहना हे की ,यंहा मंदिर पर पहले कोई रात को अकेलेनहीं जाते थे क्यों की घना जंगल होने की वजह से जंगली जानवर बहुत थे यंहा पर शेर तो आज भी मोजूद हे ,पहले इनकी संख्या  ज्यादा थी ,अब तो इनकी मात्र बहुत कम हो गयी हे ,अब इन जंगलो में सबसे ज्यादा नील गाये  रहती हे जो फसलो को बहुत नुकसान पंहुचाती हे ,रात को लोगो को खेत पर ही सोना पड़ता हे क्योंकि नील गाये झुण्ड बनाकर आती हे अगर अकेला आदमी हे तो उस पर तो  वे हमला भी कर सकती हे ,इसलिए एक से ज्यादा लोगो को सोना पड़ता हे !गर्मी में मंदिर पर पानी होने की वजह से सारे जंगली जानवर वंही पानी पिने  आते हे 

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